#sampadakexpress इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है. कोर्ट ने एक युवक को बिना किसी कारण बताए तीन महीने जेल में रखने को असंवैधानिक करार दिया. जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार इस राशि को जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि जब इतने बड़े अधिकारी अपर मुख्य सचिव, गृह का ये हाल है तो दूसरे अधिकारी किस स्तर पर काम कर रहे होंगे. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अपर मुख्य सचिव गृह ने हलफनामे में यह तक नहीं बताया कि हर्जाना क्यों न लगाया जाए. खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी शख्स को गिरफ्तार करने का कारण लिखित रूप में बताना संवैधानिक दायित्व है. इसे नजरअंदाज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.#AllahabadHighCourt #fine #unlawfuldetention #upgovt #10lakh #newsfeed2025 #newstoday2025 #NewsUpdate

#sampadakexpress इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है. कोर्ट ने एक युवक को बिना किसी कारण बताए तीन महीने जेल में रखने को असंवैधानिक करार दिया. जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार इस राशि को जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि जब इतने बड़े अधिकारी अपर मुख्य सचिव, गृह का ये हाल है तो दूसरे अधिकारी किस स्तर पर काम कर रहे होंगे. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अपर मुख्य सचिव गृह ने हलफनामे में यह तक नहीं बताया कि हर्जाना क्यों न लगाया जाए. खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी शख्स को गिरफ्तार करने का कारण लिखित रूप में बताना संवैधानिक दायित्व है. इसे नजरअंदाज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.#AllahabadHighCourt #fine #unlawfuldetention #upgovt #10lakh #newsfeed2025 #newstoday2025 #NewsUpdate
#sampadakexpress इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है. कोर्ट ने एक युवक को बिना किसी कारण बताए तीन महीने जेल में रखने को असंवैधानिक करार दिया. जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार इस राशि को जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि जब इतने बड़े अधिकारी अपर मुख्य सचिव, गृह का ये हाल है तो दूसरे अधिकारी किस स्तर पर काम कर रहे होंगे. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अपर मुख्य सचिव गृह ने हलफनामे में यह तक नहीं बताया कि हर्जाना क्यों न लगाया जाए. खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी शख्स को गिरफ्तार करने का कारण लिखित रूप में बताना संवैधानिक दायित्व है. इसे नजरअंदाज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.#AllahabadHighCourt  #fine #unlawfuldetention #upgovt #10lakh  #newsfeed2025 #newstoday2025 #NewsUpdate

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#sampadakexpress पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले मतगणना पर्यवेक्षक विवाद पर टीएमसी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. पर्यवेक्षक पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन को अधिकारी चुनने का अधिकार है. ये याचिका TMC की ओर से दायर की गई. इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील पेश करते हुए कहा कि चार मुद्दे हैं. उन्होंने कहा कि डीईओ को नोटिस 13 अप्रैल को जारी किया गया था, लेकिन हमें इसकी जानकारी 29 अप्रैल को मिली. दूसरा मुद्दा यह है कि उन्हें आशंका है कि हर बूथ में गड़बड़ी होने वाली है. उन्हें यह ऑपरेशन कहां से मिलता है? यह चौंकाने वाला है. सिब्बल ने कहा कि तीसरा मुद्दा ये है कि प्रत्येक बैठक में पहले से ही एक केंद्रीय सरकारी अधिकारी मौजूद है, जो सूक्ष्म पर्यवेक्षक का काम करता है. अब उन्हें एक और केंद्रीय सरकारी अधिकारी की क्या आवश्यकता है? चौथा मुद्दा यह है कि परिपत्र में ही कहा गया है कि एक राज्य सरकारी अधिकारी भी होना चाहिए, लेकिन वे राज्य सरकार द्वारा नामित किसी अधिकारी को नियुक्त नहीं करते हैं.#Tmc #SupremeCourt #westbengal #countingobservers #dispute #ElectionCommision  #newsfeed2025 #newstoday2025 #NewsUpdate
#sampadakexpress पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले मतगणना पर्यवेक्षक विवाद पर टीएमसी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. पर्यवेक्षक पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन को अधिकारी चुनने का अधिकार है. ये याचिका TMC की ओर से दायर की गई. इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील पेश करते हुए कहा कि चार मुद्दे हैं. उन्होंने कहा कि डीईओ को नोटिस 13 अप्रैल को जारी किया गया था, लेकिन हमें इसकी जानकारी 29 अप्रैल को मिली. दूसरा मुद्दा यह है कि उन्हें आशंका है कि हर बूथ में गड़बड़ी होने वाली है. उन्हें यह ऑपरेशन कहां से मिलता है? यह चौंकाने वाला है. सिब्बल ने कहा कि तीसरा मुद्दा ये है कि प्रत्येक बैठक में पहले से ही एक केंद्रीय सरकारी अधिकारी मौजूद है, जो सूक्ष्म पर्यवेक्षक का काम करता है. अब उन्हें एक और केंद्रीय सरकारी अधिकारी की क्या आवश्यकता है? चौथा मुद्दा यह है कि परिपत्र में ही कहा गया है कि एक राज्य सरकारी अधिकारी भी होना चाहिए, लेकिन वे राज्य सरकार द्वारा नामित किसी अधिकारी को नियुक्त नहीं करते हैं.#Tmc #SupremeCourt #westbengal #countingobservers #dispute #ElectionCommision #newsfeed2025 #newstoday2025 #NewsUpdate